
गुरगृहॅं गए पढ़न रघुराई।अलप काल विद्या सब आई ।।
जाकी सहज स्वास श्रुति चारी।सो हरि पढ़ यह कौतिक भारी ।।
विद्या विनय निपुन गुन सीला।खेलहिं खेल सकल नृपलीला ।।
करतल बान धनुष अति सोहा।देखत रूप चराचर मोहा ।।
रामचरित मानस ( १/२०३/४-७) उपर्युक्त रामचरित मानस की चौपाईयाॅं प्रस्तुत करने के पीछे मेरा मंतव्य केवल इतना है कि आदिकाल से सैन्य शिक्षा दी जाती रही है विशेष रूप से धनुष -विद्या। राजा (नृपलीला)के लिए अनिवार्य थी। साकेत महाविद्यालय में रिकॉर्ड में तो 1968 है, किन्तु इसके पूर्व प्रो.लक्ष्मीनारायण तिवारी जी एवं प्रो नारायण दत्त चौबे जी सैन्य विज्ञान विभाग से स्नातक कर चुके थे,जो बाद में इसी विभाग में प्राध्यापक रहे। इस प्रकार सैन्य विज्ञान विषय की शुरुआत सत्र 1963-1964 में हुईI प्रो. रामसुजान सिंह पहले प्राध्यापक थे, जिन्होंने महाविद्यालय में सैन्य विज्ञान विभाग की स्थापना किया था, तथा आदरणीय चौबे जी को पढ़ाया भी था। 1986 में जब शिक्षा मंत्रालय को मानव संसाधन मंत्रालय बनाया गया,तब यूजीसी ने सैन्य विज्ञान विषय का नाम रक्षा एवं स्त्रातजीय अध्ययन (सैन्य विज्ञान) विषय कर दिया।
प्रो0 नर्वदेश्वर पाण्डेय
प्राचार्य (Ex)